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शब के हैं माह मेहर हैं दिन के | शाही शायरी
shab ke hain mah mehr hain din ke

ग़ज़ल

शब के हैं माह मेहर हैं दिन के

मुनीर शिकोहाबादी

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शब के हैं माह मेहर हैं दिन के
रूप देखे बुतान-ए-कमसिन के

बोसे हैं बे-हिसाब हर दिन के
वा'दे क्यूँ टालते हो गिन गिन के

हैं वो दीवाने जज़्ब-ए-बातिन के
उतरी है शीशे में परी जिन के

अहल-ए-दिल देखते हैं आप का मुँह
आइने में सफ़ाई बातिन के

दिल रवाँ हो ख़याल-ए-यार के साथ
जाए मस्कन भी साथ साकिन के

लाग़रों पर है ज़ुल्म-ए-जाँ-शिकनी
ऐ अजल तोड़ती है क्यूँ तिनके

रहे कलकत्ता में मुख़ीर 'मुनीर'
सदक़े अपने इमाम-ए-ज़ामिन के