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शब-ए-ग़म की सहर नहीं होती | शाही शायरी
shab-e-gham ki sahar nahin hoti

ग़ज़ल

शब-ए-ग़म की सहर नहीं होती

राम कृष्ण मुज़्तर

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शब-ए-ग़म की सहर नहीं होती
दास्ताँ मुख़्तसर नहीं होती

जब किसी की नज़र नहीं होती
हम को अपनी ख़बर नहीं होती

बाज़ औक़ात अपने दिल पर भी
अहल-ए-दिल की नज़र नहीं होती

डगमगाते नहीं क़दम जिस जा
वो तिरी रहगुज़र नहीं होती

जिस मसर्रत में ग़म न हो शामिल
वो कभी मो'तबर नहीं होती

दर्द जब ख़ुद ही अपना दरमाँ हो
मिन्नत-ए-चारागर नहीं होती

दिल-ए-'मुज़्तर' से जो निकलती है
वो सदा बे-असर नहीं होती