शब-ए-फ़िराक़ में ये दिल से गुफ़्तुगू क्या है
मरी उमीद हैं वो उन की आरज़ू क्या है
रगें तमाम बदन की इधर को खींचती हैं
किसी का हाथ क़रीब-ए-रग-ए-गुलो क्या है
शिकस्त-ए-आबला-ए-पा ने आबरू रख ली
खुला न हाल कि पानी है क्या लहू क्या है
मैं अपनी मौत पे राज़ी वो लाश उठाने पर
अब आगे देखना है मर्ज़ी-ए-अदू क्या है
ये किस को आइने में आप देखे जाते हैं
जहाँ में आप से भी कोई ख़ूब-रू क्या है
सबब भी पूछ लो उन की ज़िदों से ऐ 'जावेद'
रुला रुला के हँसाएँ ये उन की ख़ू क्या है
ग़ज़ल
शब-ए-फ़िराक़ में ये दिल से गुफ़्तुगू क्या है
जावेद लख़नवी

