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शाम के साहिल पे सूरज का सफ़ीना आ लगा | शाही शायरी
sham ke sahil pe suraj ka safina aa laga

ग़ज़ल

शाम के साहिल पे सूरज का सफ़ीना आ लगा

शमीम हनफ़ी

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शाम के साहिल पे सूरज का सफ़ीना आ लगा
डूबती आँखों को ये मंज़र बहुत अच्छा लगा

दर्द के पत्थर सभी आब-ए-रवाँ में घुल गए
शोर था कितना मगर आँखों को सन्नाटा लगा

चार-सू फैली हुई मौज-ए-नफ़स की गूँज थी
मुझ को प्यासी रेत का सहरा भी इक दरिया लगा

अन-गिनत साए तिरी तस्वीर में ढलते गए
चाँदनी जागी तो हर चेहरा तिरा चेहरा लगा