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शाख़ पर ख़ून-ए-गुल रवाँ है वही | शाही शायरी
shaKH par KHun-e-gul rawan hai wahi

ग़ज़ल

शाख़ पर ख़ून-ए-गुल रवाँ है वही

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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शाख़ पर ख़ून-ए-गुल रवाँ है वही
शोख़ी-ए-रंग-ए-गुल्सिताँ है वही

सर वही है तो आस्ताँ है वही
जाँ वही है तो जान-ए-जाँ है वही

अब जहाँ मेहरबाँ नहीं कोई
कूचा-ए-यार मेहरबाँ है वही

बर्क़ सौ बार गिर के ख़ाक हुई
रौनक़-ए-ख़ाक-ए-आशियाँ है वही

आज की शब विसाल की शब है
दिल से हर रोज़ दास्ताँ है वही

चाँद तारे इधर नहीं आते
वर्ना ज़िंदाँ में आसमाँ है वही