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सवाल-ए-इश्क़ पर ता-हश्र चुप रहना पड़ा मुझ को | शाही शायरी
sawal-e-ishq par ta-hashr chup rahna paDa mujhko

ग़ज़ल

सवाल-ए-इश्क़ पर ता-हश्र चुप रहना पड़ा मुझ को

रविश सिद्दीक़ी

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सवाल-ए-इश्क़ पर ता-हश्र चुप रहना पड़ा मुझ को
हर इक इल्ज़ाम को हँसते हुए सहना पड़ा मुझ को

कभी मग़रूर तूफ़ानों को भी ठुकरा दिया मैं ने
कभी इक मौज-ए-ग़म के साथ ही बहना पड़ा मुझ को

सुकून-ए-दिल बड़ी दौलत सही ऐ हम-नशीं लेकिन
सुकूँ पा कर भी अक्सर मुज़्तरिब रहना पड़ा मुझ को

ज़माना किस क़दर बे-गाना-ए-रस्म-ए-मोहब्बत था
यहाँ तो ख़ुद से भी ना-आश्ना रहना पड़ा मुझ को

'रविश' इस बज़्म-ए-रंगीं में सुकूत-ए-ग़म का अफ़्साना
कहा जाता न था मुझ से मगर कहना पड़ा मुझ को