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सता कर सितम-कश को क्या पाइएगा | शाही शायरी
sata kar sitam-kash ko kya paiyega

ग़ज़ल

सता कर सितम-कश को क्या पाइएगा

पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़

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सता कर सितम-कश को क्या पाइएगा
जो की कुछ शिकायत तो झुँझलाइएगा

वो बर्क़-ए-तजल्ली की जो जल्वा-गाह
वहीं हज़रत-ए-दिल न रह जाइएगा

अदब की जगह मरने वालो है क़ब्र
समझ कर यहाँ पाँव फैलाईएगा

ग़रीब अब तो क़दमों में ही आ पड़ा
दिल-ए-ना-तवाँ को न ठुकराइएगा

ख़बर भी है कुछ बार-ए-इस्याँ की 'शौक़'
हुई वाँ जो पुर्सिश तो शरमाइएगा