सर-ओ-गर्दन की जुदाई देखो
तेग़-ए-क़ातिल की सफ़ाई देखो
तेग़ लचका के उठाई देखो
न मुड़क जाए कलाई देखो
मुझ से कहता है लहू मल के मिरा
ये मिरे दस्त-ए-हिनाई देखो
महफ़िल-ए-यार तलक पहुँचाया
मेरी क़िस्मत की रसाई देखो
टूट जाए न हमारी तौबा
फिर घटा चर्ख़ पे छाई देखो
मैं कहाँ और कहाँ रिफ़अ'त-ए-अर्श
मगर आहों की रसाई देखो
क्यूँ बिगड़ते हो किसी से 'आलिम'
अपनी क़िस्मत की बुराई देखो
ग़ज़ल
सर-ओ-गर्दन की जुदाई देखो
मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी

