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सर-ओ-गर्दन की जुदाई देखो | शाही शायरी
sar-o-gardan ki judai dekho

ग़ज़ल

सर-ओ-गर्दन की जुदाई देखो

मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी

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सर-ओ-गर्दन की जुदाई देखो
तेग़-ए-क़ातिल की सफ़ाई देखो

तेग़ लचका के उठाई देखो
न मुड़क जाए कलाई देखो

मुझ से कहता है लहू मल के मिरा
ये मिरे दस्त-ए-हिनाई देखो

महफ़िल-ए-यार तलक पहुँचाया
मेरी क़िस्मत की रसाई देखो

टूट जाए न हमारी तौबा
फिर घटा चर्ख़ पे छाई देखो

मैं कहाँ और कहाँ रिफ़अ'त-ए-अर्श
मगर आहों की रसाई देखो

क्यूँ बिगड़ते हो किसी से 'आलिम'
अपनी क़िस्मत की बुराई देखो