सर-ब-ज़ानूँ कोई फ़नकार अलग बैठा है
मैं यहाँ हूँ मिरा किरदार अलग बैठा है
शहर में नामा-ए-तक़दीस लिखा जाएगा
मुतमइन हूँ मिरा इंकार अलग बैठा है
तेरी तारीफ़ में सब बोल रहे हैं लेकिन
इस पे हैरत है कि मेआ'र अलग बैठा है
ग़ैर-महफ़ूज़ हैं दीवार बनाने वाले
और शहंशह सर-ए-मीनार अलग बैठा है
अब दबाओगे तो पत्थर से निकल आएगी
एक आवाज़ का हक़दार अलग बैठा है
ग़ज़ल
सर-ब-ज़ानूँ कोई फ़नकार अलग बैठा है
अहमद कमाल परवाज़ी

