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संग हैं नावक-ए-दुश्नाम हैं रुस्वाई है | शाही शायरी
sang hain nawak-e-dushnam hain ruswai hai

ग़ज़ल

संग हैं नावक-ए-दुश्नाम हैं रुस्वाई है

रज़ी अख़्तर शौक़

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संग हैं नावक-ए-दुश्नाम हैं रुस्वाई है
ये तिरे शहर का अंदाज़-ए-पज़ीराई है

कितना फैलेगा ये इक वस्ल का लम्हा आख़िर
क्या समेटोगे कि इक उम्र की तन्हाई है

कुछ तो यारों से मिला संग-ए-मलामत ही सही
किस ने इस शहर में यूँ दाद-ए-हुनर पाई है

एक पत्थर इधर आया है तो इस सोच में हूँ
मेरी इस शहर में किस किस से शनासाई है

'शौक़' जिस दिन से चराग़ाँ है ख़यालों की गली
जश्न सा जश्न है तन्हाई सी तन्हाई है