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संग और ख़िश्त-ए-मलामत से बचा लो मुझ को | शाही शायरी
sang aur KHisht-e-malamat se bacha lo mujhko

ग़ज़ल

संग और ख़िश्त-ए-मलामत से बचा लो मुझ को

काविश बद्री

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संग और ख़िश्त-ए-मलामत से बचा लो मुझ को
अपने दरबार की दीवार बना लो मुझ को

पारा-पारा हो अना और सर-ए-मग़रूर फ़ना
गेंद की तरह फ़ज़ाओं में उछालो मुझ को

लुक़्मा-ए-तर ने मिरे नफ़्स को बर्बाद किया
याद करते रहो कंकर के निवालो मुझ को

जाने किस क़ब्र का है पैकर-ए-ख़ाली मेरा
मैं खिलौना हूँ तो बस तोड़ ही डालो मुझ को

दश्त-ए-पुर-ख़ार में हूँ इक शजर-ए-ख़ाम अभी
अपनी दहलीज़ का तख़्ता ही बना लो मुझ को

इक नज़र एक नज़र एक नज़र एक नज़र
सिर्फ़ दुज़्दीदा-नज़र डाल के टालो मुझ को

'काविशम' क्या है समझ में कभी आ जाएगा
ग़म-ज़दा गीत समझ कर कभी गा लो मुझ को