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सैल-ए-बला-ए-ग़म न पूछ कितने घरौंदे ढह गए | शाही शायरी
sail-e-bala-e-gham na puchh kitne gharaunde Dah gae

ग़ज़ल

सैल-ए-बला-ए-ग़म न पूछ कितने घरौंदे ढह गए

मोहसिन एहसान

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सैल-ए-बला-ए-ग़म न पूछ कितने घरौंदे ढह गए
नाव तो ख़ैर नाव थी साथ किनारे बह गए

दिल में हुजूम-ए-शौक़ था लब पे न बात आ सकी
अब्र फ़लक पे खुल गए बीज ज़मीं पे रह गए

किस में थी ताब-ए-ज़ख़्म-ए-शौक़ किस में था ग़म का हौसला
हम ही ये दुख उठा गए हम ही ये दर्द सह गए

हम-सफ़रान-ए-शौक़ ने राह में हार मान ली
दश्त-ए-शब-ए-फ़िराक़ में हम ही अकेले रह गए

'मोहसिन'-ए-बे-नवा को भी दाद-ए-कमाल दीजिए
वो भी हदीस-ए-दर्द-ए-जाँ अपनी ग़ज़ल में कह गए