सहरा की धूप में भी शजर देखते रहे
क्या लोग थे दुआ का असर देखते रहे
हम अपने जिस्म-ओ-जाँ को ख़िज़ाँ में उतार कर
गुलनार मौसमों के हुनर देखते रहे
बारिश की आदतों का बदलना मुहाल था
जलते हुए हम अपने ही घर देखते रहे
जब भी तिरे बदन की महक हम-सफ़र रही
हम बे-चराग़ शब में सहर देखते रहे
इक शहर-ए-मह-वशाँ था कि आँखों के साथ था
हम फिर भी तेरी राहगुज़र देखते रहे
'जाज़िब' में तेरे प्यार की ख़्वाहिश शदीद थी
'जाज़िब' को अहल-ए-नक़्द-ओ-नज़र देखते रहे
ग़ज़ल
सहरा की धूप में भी शजर देखते रहे
जाज़िब क़ुरैशी

