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सग-ए-लैला के नक़्श-ए-पा हैं हम | शाही शायरी
sag-e-laila ke naqsh-e-pa hain hum

ग़ज़ल

सग-ए-लैला के नक़्श-ए-पा हैं हम

मारूफ़ देहलवी

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सग-ए-लैला के नक़्श-ए-पा हैं हम
या'नी मजनूँ के रहनुमा हैं हम

क्यूँ न हो दुश्मनों के घर मातम
दोस्त के कुश्ता-ए-जफ़ा हैं हम

तुम को दिल की भी है कसू के ख़बर
दिल में ख़ुश हो कि दिल-रुबा हैं हम

जिस क़दर हम को समझिए बे-क़द्र
क़द्र में उस से भी सिवा हैं हम

क्यूँ न मिट्टी ख़राब हो अपनी
इस ख़राबात की बिना हैं हम

किस से रखिए ग़ुबार ऐ 'मारूफ़'
एक आलम की ख़ाक-ए-पा हैं हम