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सफ़र नसीब अगर हो तो ये बदन क्यूँ है | शाही शायरी
safar nasib agar ho to ye badan kyun hai

ग़ज़ल

सफ़र नसीब अगर हो तो ये बदन क्यूँ है

शमीम हनफ़ी

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सफ़र नसीब अगर हो तो ये बदन क्यूँ है
दयार-ए-ग़ैर तुम्हारे लिए वतन क्यूँ है

हवा-ए-शबनम-ओ-गुल है तो बे-ख़ुदी कैसी
हिसार-ए-ज़ात में आशोब-ए-मा-ओ-मन क्यूँ है

बस एक अक्स-ए-नज़ारा है इंकिशाफ़-ए-वजूद
कुलाह-ए-शीशा-गराँ में ये बाँकपन क्यूँ है

निशात-ए-बे-तलबी जादा-ए-नजात हुआ
ख़बर नहीं कि उसी राह में चमन क्यूँ है

लिबास-ख़ाक शफ़क़-रंग मिस्ल-ए-शाख़-ए-चिनार
बिसात-ए-सोख़्ता-आमोज़ फ़िक्र-ओ-फ़न क्यूँ है

गराँ है तब-ए-ज़माना पे हर सदा-ए-नफ़स
ख़याल-ओ-ख़्वाब पे नुक़्तों का पैरहन क्यूँ है