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सदा रंग-ए-मीना चमकता रहा | शाही शायरी
sada rang-e-mina chamakta raha

ग़ज़ल

सदा रंग-ए-मीना चमकता रहा

शाद लखनवी

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सदा रंग-ए-मीना चमकता रहा
हमेशा ये सब्ज़ा लहकता रहा

वो कूचा है उल्फ़त का जिस में सदा
ख़िज़र राह भूला भटकता रहा

खुला ये जहाँ पर्दा-ए-दर हिला
जहाँ जो रहा सर पटकता रहा

बता लाग़री से है पर बाल भी
मैं आँखों में सब की खटकता रहा

लबालब यहाँ हो चुका जाम-ए-उम्र
वहाँ साग़र-ए-मय छलकता रहा

बरसती रही क़ब्र पर बेकसी
ग़रीबों का मदफ़न टपकता रहा

रहा नारा-ज़न कू-ए-जानाँ में 'शाद'
गुलिस्ताँ में बुलबुल चहकता रहा