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सदा-ए-दिल ही को आवाज़ा-ए-जहाँ न कहो | शाही शायरी
sada-e-dil hi ko aawaza-e-jahan na kaho

ग़ज़ल

सदा-ए-दिल ही को आवाज़ा-ए-जहाँ न कहो

आनंद नारायण मुल्ला

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सदा-ए-दिल ही को आवाज़ा-ए-जहाँ न कहो
ख़ुद अपनी हद्द-ए-नज़र ही को आसमाँ न कहो

हर एक ज़र्रे को हँसता दिया बनाना है
फ़लक के चाँद-सितारों की दास्ताँ न कहो

न लाओ या तो ज़बाँ पर हदीस-ए-नाकामी
नहीं तो अपनी तमन्ना को फिर जवाँ न कहो

ये अपना घर है चलो इस पे तसफ़िया कर लें
क़फ़स कहूँ न इसे मैं तुम आशियाँ न कहो

न इत्तिफ़ाक़-ए-अमल है न एक सम्त-ए-क़दम
अभी तो भीड़ है ये इस को कारवाँ न कहो

ख़ुसूमतों में ख़िरद की जहाँ सुने न सुने
मिरे सुरूद-ए-मोहब्बत को राएगाँ न कहो

जहाँ हर एक को सज्दे का हक़ नहीं हासिल
उसे ख़ुदा-ए-मोहब्बत का आस्ताँ न कहो

उजड़ भी जाए नशेमन तो फिर नशेमन है
क़फ़स में फूल भी रख दें तो आशियाँ न कहो

ज़माना मुझ पे नहीं तुम पे ख़ंदा-ज़न होगा
तुम आज दोस्तों 'मुल्ला' को नुक्ता-दाँ न कहो