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सब्ज़ा तुम्हारे रुख़ के लिए तंग हो गया | शाही शायरी
sabza tumhaare ruKH ke liye tang ho gaya

ग़ज़ल

सब्ज़ा तुम्हारे रुख़ के लिए तंग हो गया

मुनीर शिकोहाबादी

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सब्ज़ा तुम्हारे रुख़ के लिए तंग हो गया
तूती का अक्स आइने में ज़ंग हो गया

पस्त-ओ-बुलंद दहर में खाता हूँ ठोकरें
ऐसा समंद-ए-उम्र-ए-रवाँ लंग हो गया

बिस्मिल को भी तड़पने की मिलती नहीं जगह
क्या अरसा-ए-हयात-ए-जहाँ तंग हो गया

हम-ज़ाद से भी ये तन-ए-लाग़र हुआ सुबुक
तोला तो अपने साए का पासंग हो गया

जोश-ए-जुनूँ ने जिस्म के पुर्ज़े उड़ा दिए
रख़्त-ए-बरहनगी भी मुझे तंग हो गया

उस बुत से जिस्म-ए-ज़ार जो लिपटा शब-ए-विसाल
आलम को एहतिमाल-ए-रग-ए-संग हो गया

मज़मून-ए-आह-ए-गर्म ने जल्वा दिखा दिया
उड़ कर हवा में नामा मिरा चंग हो गया

नाले किए तसव्वुर-ए-गेसू में रात भर
दिल हम-सफ़ीर-ए-मुर्ग़-ए-शब-आहंग हो गया

सर कट के गिर पड़ा उसी क़ातिल के पाँव पर
जल्लाद से मिलाप दम-ए-जंग हो गया

उड़ उड़ के मेरे चेहरे पर ऐ शोख़ रह गया
मुर्ग़-ए-शिकस्ता-बाल मिरा रंग हो गया

करता रहा लुग़ात की तहक़ीक़ उम्र भर
आमाल-नामा नुस्ख़ा-ए-फ़रहंग हो गया

मुँह तक भी ज़ोफ़ से नहीं आ सकती दिल की बात
दरवाज़ा घर से सैकड़ों फ़रसंग हो गया

महरूम हूँ मैं ख़िदमत-ए-उस्ताद से 'मुनीर'
कलकत्ता मुझ को गोर से भी तंग हो गया