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सब तोड़ के बंधन दुनिया के मैं प्यार की जोत जगाऊँगी | शाही शायरी
sab toD ke bandhan duniya ke main pyar ki jot jagaungi

ग़ज़ल

सब तोड़ के बंधन दुनिया के मैं प्यार की जोत जगाऊँगी

शबनम शकील

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सब तोड़ के बंधन दुनिया के मैं प्यार की जोत जगाऊँगी
अब माया-जाल से निकलूँगी और जोगनिया कहलाऊँगी

तू ने तो प्रेम की कुटिया को पल-भर में जला कर राख किया
अब मेरी चिता तय्यार करो मैं साथ सती हो जाऊँगी

ये दुनिया लोभन नारी है हँस हँस कर सब से कहती है
तुम सोने के बन कर आओ मैं जै-माला पहनाऊँगी

तुम मन धन प्रेम के मंदिर पर मैं वार के बाहर बैठी हूँ
इक साँस की दूरी अटकी है अब इस की भेंट चढ़ाऊँगी

ये मैली ओढ़नी ओढ़ूँगी वो आएगा तो धो लूँगी
वो खेले धन में दौलत में अब मैं उस द्वार न जाऊँगी

इक मूरख से ब्योपारी ने बिन-मोल मिरा मन बेच दिया
मैं नगरी नगरी घूमूंगी और प्रेम का मोल चुकाऊँगी

नैनों का कजरा भीग गया बैनी का गजरा टूट गया
अब भोर-भए घर आया तो बन कर मैं सो जाऊँगी