सब मुझे आरज़ी सा लगता है
तू मगर ज़िंदगी सा लगता है
आइना है मगर न जाने क्यूँ
आदमी आदमी सा लगता है
ख़ुद को कितना भुला दिया मैं ने
तू भी अब अजनबी सा लगता है
इश्क़ में ज़िंदगी बसर करना
अक़्ल को ख़ुद-कुशी सा लगता है
जो तिरे हिज्र में मिला 'मोमिन'
बस वही ग़म ख़ुशी सा लगता है
ग़ज़ल
सब मुझे आरज़ी सा लगता है
अब्दुर्रहमान मोमिन

