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सब को वहशत है मिरी वहशत के सामाँ देख कर | शाही शायरी
sab ko wahshat hai meri wahshat ke saman dekh kar

ग़ज़ल

सब को वहशत है मिरी वहशत के सामाँ देख कर

रईस नियाज़ी

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सब को वहशत है मिरी वहशत के सामाँ देख कर
चाक-दामाँ देख कर चाक-ए-गरेबाँ देख कर

बे-ख़बर काँटों से था अहल-ए-मोहब्बत का शुऊ'र
पाँव रखने थे ज़मीन-ए-कू-ए-जानाँ देख कर

अल्लाह अल्लाह जज़्बा-ए-उल्फ़त की मोजिज़-कारियाँ
वो परेशाँ हो गए मुझ को परेशाँ देख कर

याद आया फिर मुझे अफ़साना-ए-तूर-ओ-कलीम
इक तजल्ली सी तिरे आरिज़ पे रक़्साँ देख कर

चारागर अब मुझ से मेरी लज़्ज़त-ए-ईज़ा न पूछ
ख़ंदा-ज़न होते हैं ज़ख़्म-ए-दिल नमकदाँ देख कर

है मोहब्बत का अगर दोनों तरफ़ यकसाँ असर
वो परेशाँ क्यूँ नहीं मुझ को परेशाँ देख कर

इस में मुज़्मर हैं बहुत नग़्मे हयात-ए-इश्क़ के
छेड़ मिज़राब-ए-जुनूँ साज़-ए-रग-ए-जाँ देख कर

इस जुनूँ का चारागर अब और ही कुछ कर इलाज
और वहशत बढ़ चली है कुंज-ए-ज़िंदाँ देख कर

वा नहीं होता लब-ए-शिकवा सर-ए-महशर 'रईस'
अपने सर पर ख़ंजर-ए-क़ातिल का एहसाँ देख कर