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सब की आँखों में जो समाया था | शाही शायरी
sab ki aaankhon mein jo samaya tha

ग़ज़ल

सब की आँखों में जो समाया था

अबु मोहम्मद सहर

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सब की आँखों में जो समाया था
कौन था वो कहाँ से आया था

किस ने की आज पुर्सिश-ए-अहवाल
कोई अपना था या पराया था

मिट गए हम तो ये हुआ मालूम
भूल कर कोई मुस्कुराया था

एक लज़्ज़त थी ख़ुद-फ़रेबी में
वर्ना किस ने फ़रेब खाया था

आ गईं याद फिर वही बातें
कल ब-मुश्किल जिन्हें भुलाया था

सब थे आसेब-ए-बज़्म के मारे
हम पे तन्हाइयों का साया था

उम्र गुज़री 'सहर' मोहब्बत में
हम ने दिल कुछ अजीब पाया था