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सायों से लिपट रहे थे साए | शाही शायरी
sayon se lipaT rahe the sae

ग़ज़ल

सायों से लिपट रहे थे साए

सूफ़ी तबस्सुम

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सायों से लिपट रहे थे साए
दिल फिर भी फ़ज़ा में जगमगाए

बे-सर्फ़ा भटक रही थीं राहें
हम नूर-ए-सहर को ढूँड लाए

ये गर्दिश-ए-रोज़गार क्या है
हम शाम-ओ-सहर को देख आए

हर सुब्ह तिरी नज़र का परतव
हर शाम तिरी भवों के साए

है फ़स्ल-ए-बहार का ये दस्तूर
जो आए चमन में मुस्कुराए

क्या चीज़ है ये फ़साना-ए-दिल
जब कहने लगें तो भूल जाए

तुम ही न समझ सके मिरी बात
अब किस की समझ में बात आए

सूनी रही इंतिज़ार की रात
अश्कों ने बहुत दिए जलाए

वो दिन जो बहार-ए-ज़िंदगी थे
वो दिन कभी लौट कर न आए