सारी दुनिया के तअल्लुक़ से जो सोचा जाता
आदमी इतने क़बीलों में न बाँटा जाता
दिल का अहवाल न पूछो कि बहुत रोज़ हुए
इस ख़राबे की तरफ़ मैं नहीं आता जाता
ज़िंदगी तिश्ना-दहानी का सफ़र थी शायद
हम जिधर जाते उसी राह पे सहरा जाता
शाम होते ही कोई शम्अ जला रखनी थी
जब दरीचे से हवा आती तो देखा जाता
रौशनी अपने घरोंदों में छुपी थी वर्ना
शहर के शहर पे शब-ख़ून न मारा जाता
सारे काग़ज़ पे बिछी थीं मिरी आँखें 'क़ैसर'
इतने आँसू थे कि इक हर्फ़ न लिक्खा जाता
ग़ज़ल
सारी दुनिया के तअल्लुक़ से जो सोचा जाता
क़ैसर-उल जाफ़री

