साक़ी की निगाहों का पैग़ाम नहीं आता
जिस जाम का तालिब हूँ वो जाम नहीं आता
मय-ख़्वारों की लग़्ज़िश पर दुनिया की निगाहें हैं
ना-फ़हमी-ए-वाइ'ज़ पर इल्ज़ाम नहीं आता
अल्लाह-रे मजबूरी अल्लाह-रे महरूमी
या बारिश-ए-सहबा थी या जाम नहीं आता
बेताबी-ए-दिल राज़-ए-तस्कीन-ए-मोहब्बत है
अच्छे हैं वही जिन को आराम नहीं आता
या दिल के धड़कते ही उठती थी नज़र उन की
या दिल का तड़पना भी अब काम नहीं आता
मय-कश की भी सुनता है ज़ाहिद की भी सुनता है
उस दर से कभी कोई नाकाम नहीं आता
मेरी ही नज़र 'शाइर' रुस्वा है ज़माने में
हुस्न-ए-सर-ए-महफ़िल पर इल्ज़ाम नहीं आता
ग़ज़ल
साक़ी की निगाहों का पैग़ाम नहीं आता
शायर फतहपुरी

