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साँस उखड़ी हुई सूखे हुए लब कुछ भी नहीं | शाही शायरी
sans ukhDi hui sukhe hue lab kuchh bhi nahin

ग़ज़ल

साँस उखड़ी हुई सूखे हुए लब कुछ भी नहीं

सुल्तान अख़्तर

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साँस उखड़ी हुई सूखे हुए लब कुछ भी नहीं
प्यास का नाम ही रौशन है बस अब कुछ भी नहीं

सुब्ह तक फिर भी नहीं बुझते हैं आँखों के चराग़
जानता हूँ कि पस-ए-पर्दा-ए-शब कुछ भी नहीं

सर-ए-एहसास पे दस्तार-ए-फ़ज़ीलत न रही
बस कि अब सिलसिला-ए-नाम-ओ-नसब कुछ भी नहीं

गुल-ए-इमकान न सरसब्ज़ कोई बर्ग-ए-उमीद
या'नी अब के तो सर-ए-शाख़-ए-तलब कुछ भी नहीं

बे-तअल्लुक़ रहे बरसों तो कोई बात भी थी
इन दिनों तुम से न मिलने का सबब कुछ भी नहीं

वज़्अ'-दारी ही बिखरने नहीं देती 'अख़्तर'
वर्ना हम टूटे हुए लोगों में अब कुछ भी नहीं