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सामने जी सँभाल कर रखना | शाही शायरी
samne ji sambhaal kar rakhna

ग़ज़ल

सामने जी सँभाल कर रखना

रसा चुग़ताई

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सामने जी सँभाल कर रखना
फिर वही अपना हाल कर रखना

आ गए हो तो इस ख़राबे में
अब क़दम देख-भाल कर रखना

शाम ही से बरस रही है रात
रंग अपने सँभाल कर रखना

इश्क़ कार-ए-पयम्बराना है
जिस को छूना मिसाल कर रखना

किश्त करना मोहब्बतें और फिर
ख़ुद उसे पाएमाल कर रखना

रोज़ जाना उदास गलियों में
रोज़ ख़ुद को निढाल कर रखना

सख़्त मुश्किल है आइनों से 'रसा'
वाहिमों को निकाल कर रखना