साहब दिलों से राह में आँखें मिला के देख
रखता है तू भी दिल तो उसे आज़मा के देख
पहचानने की प्यार को कोशिश कभी तो कर
ख़ुद को कभी तो अपने बदन से हटा के देख
या लज़्ज़तों को ज़हर समझ और दूर रह
या शो'ला-ए-गुनाह में दामन जला के देख
हर-चंद रेग-ज़ार सही ज़िंदगी मगर
पल-भर को अपने जिस्म का जादू जगा के देख
साए की तरह साथ चलेगी कोई सदा
सुनसान जंगलों में अकेले भी जा के देख
ग़ज़ल
साहब दिलों से राह में आँखें मिला के देख
फ़ुज़ैल जाफ़री

