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साफ़ हम तुम से आज कितने हैं | शाही शायरी
saf hum tum se aaj kitne hain

ग़ज़ल

साफ़ हम तुम से आज कितने हैं

मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

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साफ़ हम तुम से आज कितने हैं
सब तुम्हें बद-मिज़ाज कहते हैं

तेरे बीमार-ए-ग़म को है वो मरज़
हुकमा ला-इलाज कहते हैं

मेरी धड़कन से वो भी न बेचैन
हाँ इसे इख़्तिलाज कहते हैं

क्या अनासिर में है तरी क़ुदरत
बस इसे इम्तिज़ाज कहते हैं

है शहादत की आरज़ू क़ातिल
दिल की हम एहतियाज कहते हैं

दाग़-ए-सौदा ने सरफ़राज़ किया
हम इसे अपना ताज कहते हैं

ख़ूब पैदा किया है नाम 'अंजुम'
लोग आशिक़-मिज़ाज कहते हैं