साफ़ हम तुम से आज कितने हैं
सब तुम्हें बद-मिज़ाज कहते हैं
तेरे बीमार-ए-ग़म को है वो मरज़
हुकमा ला-इलाज कहते हैं
मेरी धड़कन से वो भी न बेचैन
हाँ इसे इख़्तिलाज कहते हैं
क्या अनासिर में है तरी क़ुदरत
बस इसे इम्तिज़ाज कहते हैं
है शहादत की आरज़ू क़ातिल
दिल की हम एहतियाज कहते हैं
दाग़-ए-सौदा ने सरफ़राज़ किया
हम इसे अपना ताज कहते हैं
ख़ूब पैदा किया है नाम 'अंजुम'
लोग आशिक़-मिज़ाज कहते हैं
ग़ज़ल
साफ़ हम तुम से आज कितने हैं
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

