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रूह के ज़ख़्म भर रहा है कौन | शाही शायरी
ruh ke zaKHm bhar raha hai kaun

ग़ज़ल

रूह के ज़ख़्म भर रहा है कौन

अज़्म शाकरी

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रूह के ज़ख़्म भर रहा है कौन
मेरे अंदर उतर रहा है कौन

मैं तो ज़िंदा हूँ अपने लहजे में
लम्हा लम्हा ये मर रहा है कौन

लोग शीशा-सिफ़त नहीं हैं मगर
रेज़ा रेज़ा बिखर रहा है कौन

पत्थरों के कलेजे फटने लगे
सुब्ह-दम आह भर रहा है कौन

सब चराग़ों के सर सलामत हैं
फिर अँधेरों से डर रहा है कौन

दहरिये सिर्फ़ इतना बतला दें
रंग फूलों में भर रहा है कौन