रूह के ज़ख़्म भर रहा है कौन
मेरे अंदर उतर रहा है कौन
मैं तो ज़िंदा हूँ अपने लहजे में
लम्हा लम्हा ये मर रहा है कौन
लोग शीशा-सिफ़त नहीं हैं मगर
रेज़ा रेज़ा बिखर रहा है कौन
पत्थरों के कलेजे फटने लगे
सुब्ह-दम आह भर रहा है कौन
सब चराग़ों के सर सलामत हैं
फिर अँधेरों से डर रहा है कौन
दहरिये सिर्फ़ इतना बतला दें
रंग फूलों में भर रहा है कौन
ग़ज़ल
रूह के ज़ख़्म भर रहा है कौन
अज़्म शाकरी

