रूह के जलते ख़राबे का मुदावा भी नहीं
दर्द वो बादल है जो खुल कर बरसता भी नहीं
शहर के ज़िंदाँ ने पहना दीं वो ज़ंजीरें मुझे
मेरी वहशत को मयस्सर दिल का सहरा भी नहीं
जिस में बह जाए सफ़ीने की तरह मेरा वजूद
मेरी आँखों से रवाँ ग़म का वो दरिया भी नहीं
कर्ब का सूरज सिवा नेज़े पे है ठहरा हुआ
दिल मिरा है बर्फ़-ज़ार ऐसा पिघलता भी नहीं
मुझ को यकजाई की हसरत से भला क्या वास्ता
मैं तो जी भर कर सर-ए-आफ़ाक़ बिखरा भी नहीं
मुद्दतों दर पर मिरे वो दस्तकें देता रहा
मैं मगर वो नींद का माता कि चौंका भी नहीं
ग़ज़ल
रूह के जलते ख़राबे का मुदावा भी नहीं
आरिफ़ अब्दुल मतीन

