रूदाद-ए-शौक़ ये है मिरी मुख़्तसर तमाम
रानाइयों में खो गया ज़ौक़-ए-नज़र तमाम
गुज़रा है गुल-बदन कोई मेरी तलाश में
महकी हुई है आज मिरी रहगुज़र तमाम
वो दिन भी क्या थे जब थी हवाओं से गुफ़्तुगू
अब हम से बात करते हैं दीवार-ओ-दर तमाम
ख़ुद अपना एहतिसाब गवारा नहीं उन्हें
औरों में ऐब ढूँडते हैं दीदा-वर तमाम
तन्हाइयाँ नसीब का उन्वान बन गईं
एक एक कर के छूट गए हम-सफ़र तमाम
होने लगे हैं मेरी ख़मोशी पे तब्सिरे
अब जान ले के छोड़ेंगे ये चारागर तमाम
क्या सोच कर चले थे 'ज़िया' राह-ए-शौक़ में
शायद न हो सके ये सफ़र उम्र-भर तमाम
ग़ज़ल
रूदाद-ए-शौक़ ये है मिरी मुख़्तसर तमाम
बख़्तियार ज़िया

