रुख़ अपना आइना मुझ को बना के देख लिया
मिरी निगाह के पर्दे में आ के देख लिया
जो दोस्त थे उन्हें दुश्मन बना के देख लिया
ज़बाँ पे दिल की तमन्ना को ला के देख लिया
हक़ीक़त-ए-ग़म-ए-हस्ती के नक़्श मिट न सके
तिलिस्म-ख़ाना-ए-अरमाँ बना के देख लिया
वो बे-ख़बर मिरे सोज़-ए-जिगर से फिर भी नहीं
हर इक निगाह पे पर्दा गिरा के देख लिया
उन्हें क़ुबूल नहीं इश्क़-ए-राएगाँ अपना
क़दम क़दम पे निगाहें बिछा के देख लिया
अब और इस से सिवा चाहते हो क्या 'मुल्ला'
ये कम है उस ने तुम्हें मुस्कुरा के देख लिया
ग़ज़ल
रुख़ अपना आइना मुझ को बना के देख लिया
आनंद नारायण मुल्ला

