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रोता हूँ क़द्र-दान-ए-मता-ए-हुनर को मैं | शाही शायरी
rota hun qadr-dan-e-mata-e-hunar ko main

ग़ज़ल

रोता हूँ क़द्र-दान-ए-मता-ए-हुनर को मैं

इशरत क़ादरी

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रोता हूँ क़द्र-दान-ए-मता-ए-हुनर को मैं
लाऊँ कहाँ से ढूँढ के उस दीदा-वर को मैं

सद हासिल-ए-तरब है रिफ़ाक़त की ये घड़ी
वो मुझ को देखते हैं चराग़-ए-सहर को मैं

मुद्दत हुई है चाक-ए-गरेबाँ सिए हुए
करता हूँ याद मौसम-ए-दीवाना-गर को मैं

लब पर हैं ज़िंदगी की दुआएँ बहर-नफ़स
मायूस पा रहा हूँ मसीहा नज़र को मैं

देखा है तुम ने कूचा-ए-दिलदार में उसे
पहचानता हूँ 'ग़ालिब'-ए-आशुफ़्ता-सर को मैं