रोता हूँ क़द्र-दान-ए-मता-ए-हुनर को मैं
लाऊँ कहाँ से ढूँढ के उस दीदा-वर को मैं
सद हासिल-ए-तरब है रिफ़ाक़त की ये घड़ी
वो मुझ को देखते हैं चराग़-ए-सहर को मैं
मुद्दत हुई है चाक-ए-गरेबाँ सिए हुए
करता हूँ याद मौसम-ए-दीवाना-गर को मैं
लब पर हैं ज़िंदगी की दुआएँ बहर-नफ़स
मायूस पा रहा हूँ मसीहा नज़र को मैं
देखा है तुम ने कूचा-ए-दिलदार में उसे
पहचानता हूँ 'ग़ालिब'-ए-आशुफ़्ता-सर को मैं
ग़ज़ल
रोता हूँ क़द्र-दान-ए-मता-ए-हुनर को मैं
इशरत क़ादरी

