रोज़ देने लगे आज़ार ये क्या
और समझते हो उसे प्यार ये क्या
जुर्म-ए-उल्फ़त की है तक़दीर ये क्यूँ
हम से रहते हैं वो बेज़ार ये क्या
ना-तवानी हुई हमदर्द मिरी
दर्द कहता है कि सरकार ये क्या
तुम तो ग़ारत-गर-ए-दिल हो साहब
फिर तुम्हें कहते हैं दिलदार ये क्या
आह की मैं ने तो बोले है है
जी उठा 'आशिक़'-ए-बीमार ये क्या
ग़ज़ल
रोज़ देने लगे आज़ार ये क्या
आशिक़ अकबराबादी

