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रोज़ देने लगे आज़ार ये क्या | शाही शायरी
rose dene lage aazar ye kya

ग़ज़ल

रोज़ देने लगे आज़ार ये क्या

आशिक़ अकबराबादी

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रोज़ देने लगे आज़ार ये क्या
और समझते हो उसे प्यार ये क्या

जुर्म-ए-उल्फ़त की है तक़दीर ये क्यूँ
हम से रहते हैं वो बेज़ार ये क्या

ना-तवानी हुई हमदर्द मिरी
दर्द कहता है कि सरकार ये क्या

तुम तो ग़ारत-गर-ए-दिल हो साहब
फिर तुम्हें कहते हैं दिलदार ये क्या

आह की मैं ने तो बोले है है
जी उठा 'आशिक़'-ए-बीमार ये क्या