रोने में अब्र-ए-तर की तरह चश्म को मेरे जोश है
नाला में आह र'अद सा शोर है और ख़रोश है
र'अद ने शोर से पुकार मस्तों को ये नवेद दी
तुम हो किधर ऐ मय-कशो मौसम नाए-ओ-नोश है
चाक करूँ हूँ जेब-ए-सब्र ताले-ए-अंदलीब देख
सुनने को उस का दर्द-ए-दिल गुल ही ब-शक्ल-ए-गोश है
किन ने चमन में मय-कशी की है सबा तू सच कहो
जाम है गुल के हाथ में ग़ुंचा सुबू ब-दोश है
कौन दिवाना मर गया उस के अज़ा में अब तलक
उस के लिबास सर-ब-सर चश्म सियाह-पोश है
नाला है ख़ाना-ज़ाद-ए-इश्क़ लेक कहाँ सर-ओ-दिमाग़
अपने तो क़ाफ़िले के बीच जो है जरस ख़मोश है
ग़ज़ल
रोने में अब्र-ए-तर की तरह चश्म को मेरे जोश है
इश्क़ औरंगाबादी

