रिश्ता-ए-दम से जान है तन में
मनके मनके से तेरे सिमरन में
दीदा-ए-दिल से देखता हूँ तुझे
सोचता हूँ जब अपने मैं मन में
गुल है शबनम से आह दीदा-ए-तर
बिन वो गुल-रू के सुब्ह-ए-गुलशन में
कर्बला के बगूले सारे काश
ख़ाक उड़ाता हुआ फिरूँ बन में
गौहर-ए-आब-दार के मानिंद
अश्क ग़लताँ हैं मेरे दामन में
सर्व-ए-गुलज़ार सा सुहाता है
वो मिरा यार घर के आँगन में
अपनी सूरत को ऐ शहनशह-ए-हुस्न
'इश्क़' के देख दिल के दर्पन में
ग़ज़ल
रिश्ता-ए-दम से जान है तन में
इश्क़ औरंगाबादी

