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रिश्ता-ए-दम से जान है तन में | शाही शायरी
rishta-e-dam se jaan hai tan mein

ग़ज़ल

रिश्ता-ए-दम से जान है तन में

इश्क़ औरंगाबादी

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रिश्ता-ए-दम से जान है तन में
मनके मनके से तेरे सिमरन में

दीदा-ए-दिल से देखता हूँ तुझे
सोचता हूँ जब अपने मैं मन में

गुल है शबनम से आह दीदा-ए-तर
बिन वो गुल-रू के सुब्ह-ए-गुलशन में

कर्बला के बगूले सारे काश
ख़ाक उड़ाता हुआ फिरूँ बन में

गौहर-ए-आब-दार के मानिंद
अश्क ग़लताँ हैं मेरे दामन में

सर्व-ए-गुलज़ार सा सुहाता है
वो मिरा यार घर के आँगन में

अपनी सूरत को ऐ शहनशह-ए-हुस्न
'इश्क़' के देख दिल के दर्पन में