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रस्ते में कोई आ के इनाँ-गीर हो न जाए | शाही शायरी
raste mein koi aa ke inan-gir ho na jae

ग़ज़ल

रस्ते में कोई आ के इनाँ-गीर हो न जाए

मोहसिन ज़ैदी

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रस्ते में कोई आ के इनाँ-गीर हो न जाए
ये जज़्बा-ए-जुनूँ मिरा ज़ंजीर हो न जाए

उस को जो अब किसी से शिकायत नहीं रही
फिर क्यूँ वो सब से मिल के बग़ल-गीर हो न जाए

मैं ने ज़बान दी है तो लब वा करूँगा क्या
लेकिन ज़बान-ए-ख़ल्क़ से तशहीर हो न जाए

मंज़र ये हश्र-ख़ेज़ जो पेश-ए-निगाह है
डरता हूँ मेरे ख़्वाब की ताबीर हो न जाए

आँखों में बस गई है वो तस्वीर इस तरह
मेरी निगाह-ए-शौक़ भी तस्वीर हो न जाए

'मोहसिन' न जाने सुब्ह नुमूदार होगी कब
ये शाम-ए-बे-चराग़ ही तक़दीर हो न जाए