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रस्म-ए-दुनिया जान कर हरगिज़ न याराना करो | शाही शायरी
rasm-e-duniya jaan kar hargiz na yarana karo

ग़ज़ल

रस्म-ए-दुनिया जान कर हरगिज़ न याराना करो

सुलतान रशक

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रस्म-ए-दुनिया जान कर हरगिज़ न याराना करो
दोस्ती के बाब में दिल का कहा माना करो

एक धीमा सा तबस्सुम रस्म ही सी बन गया
दोस्तो अपने पराए को तो पहचाना करो

रौशनी का क़हत है पर फ़िक्र-ए-फ़र्दा किस लिए
ख़ून की तनवीर से रौशन सियह-ख़ाना करो

छोटी-मोटी बात हो तो जिंस-ए-ग़म देते रहो
जुर्म हो संगीन तो ख़ुशियों का जुर्माना करो

रस्म-ए-शब्बीरी दवाम-ए-ज़ीस्त है सुल्तान-'रश्क'
ज़ीस्त करनी है अगर तो सरफ़रोशाना करो