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रक़्स-ए-नैरंगी है नज़्ज़ारों के बीच | शाही शायरी
raqs-e-nairangi hai nazzaron ke bich

ग़ज़ल

रक़्स-ए-नैरंगी है नज़्ज़ारों के बीच

रफ़ीक़ ख़याल

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रक़्स-ए-नैरंगी है नज़्ज़ारों के बीच
जी रहा हूँ शोबदा-कारों के बीच

एक दुनिया को है लुट जाने का डर
एक हम हैं लुट गए यारों के बीच

शिकवा-ए-जौर-ओ-जफ़ा किस से करूँ
प्यार से महरूम हूँ प्यारों के बीच

मुल्क-ओ-मिल्लत क़ौम-ओ-मज़हब दोस्तो
क्या नहीं बिकता ख़रीदारों के बीच

अज़्मत-ए-हव्वा का इक और आइना
हो गया नीलाम बाज़ारों के बीच

अस्ल रिश्ता तो ज़मीं से है मिरा
याद आया मुझ को सय्यारों के बीच

शौक़-ए-ख़ुद-आराई के हाथों हुआ
इक हयूला क़ैद दीवारों के बीच

या-इलाही रहम करना आज वो
आ गए चल के तलब-गारों के बीच

मेरे दम से ही हुई है रौशनी
दश्त-ओ-सहरा और कोहसारों के बीच

ऐ बहार-ए-अब्र-ए-नौ जल्दी बरस
जल रहे हैं ख़्वाब अँगारों के बीच

मुझ में है मौजूद पर्वाज़-ए-'ख़याल'
मो'तबर हूँ मैं भी फ़नकारों के बीच