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रंज-ओ-मलाल-ओ-ग़म से किसी को मफ़र नहीं | शाही शायरी
ranj-o-malal-o-gham se kisi ko mafar nahin

ग़ज़ल

रंज-ओ-मलाल-ओ-ग़म से किसी को मफ़र नहीं

शोला करारवी

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रंज-ओ-मलाल-ओ-ग़म से किसी को मफ़र नहीं
आज़ाद क़ैद-ए-फ़िक्र से कोई बशर नहीं

दिल में लगी है आग जिगर पर असर नहीं
ये दर्द और है जो इधर है उधर नहीं

ज़र्रे में कैसे वुसअ'त-ए-कौनैन आ गई
ख़ुद अपनी मर्दुमक पे हमारी नज़र नहीं

खनके न उन की बज़्म का साग़र कोई मगर
अपनी शिकस्त शीशा-ए-दिल की ख़बर नहीं

दम-भर का फ़ासला है हयात-ओ-ममात में
मंज़िल कोई अब उस से सिवा मुख़्तसर नहीं

हिचकी शब-ए-फ़िराक़ की कुछ कह रही है और
या'नी हमारी याद से वो बे-ख़बर नहीं

पीरी में ख़्वाब देख रहा हूँ शबाब के
जैसे अभी है रात नुमूद-ए-सहर नहीं

क़ैद-ए-सुजूद-ए-दैर-ओ-हरम फिर है क्या ज़रूर
वो ला-मकाँ है उस का कोई संग-ए-दर नहीं

मैं देखता हूँ सनअ'त-ए-सन्ना-ए-रोज़गार
देखूँ तुम्हें ये अपना मज़ाक़-ए-नज़र नहीं

मरने के बा'द होती है महसूस अब कमी
बज़्म-ए-अदब में 'शो'ला' तहम्मुल दिगर नहीं