रंग अब यूँ तिरी तस्वीर में भरता जाऊँ
तुझ पे रंग आए मैं जाँ से भी गुज़रता जाऊँ
वो दिया हूँ कि हवाओं से भी डरता जाऊँ
फ़र्त-ए-पिंदार से फिर रक़्स भी करता जाऊँ
अजब आशोब दिया मेरे ख़ुदा ने मुझ को
इक तमन्ना-ए-मसीहाई में मरता जाऊँ
मुझ को झुटलाती रहीं वो मिरी मुनकिर आँखें
और मैं सूरत-ए-ख़ुर्शीद उभरता जाऊँ
मेरे चेहरे पे न जाओ कि मिरा हुस्न है ये
अपने लिक्खे हुए लफ़्ज़ों में निखरता जाऊँ
ऐसी तन्हाई का आलम है कि हर शख़्स के पास
इक पज़ीराई की हसरत में ठहरता जाऊँ
'शौक़' शायर भी हूँ अंदेशा-ए-जाँ भी है मुझे
रूह में शोर करूँ लफ़्ज़ में डरता जाऊँ
ग़ज़ल
रंग अब यूँ तिरी तस्वीर में भरता जाऊँ
रज़ी अख़्तर शौक़

