रम्ज़-आशना मिले कई अहल-ए-नज़र मिले
फिर भी ये जुस्तुजू रही कोई बशर मिले
आदिल भी हो रहीम भी हो कारसाज़ भी
सब कुछ तो हो मगर ज़रा हम से नज़र मिले
इंकार-ए-सज्दा है यहाँ किस रू-सियाह को
शायान-ए-सज्दा भी तो मगर कोई दर मिले
ये है कमाल-ए-जहल कि मेराज-ए-आगही
हर लम्हा जुस्तुजू है कुछ अपनी ख़बर मिले
ऐश-ए-गुरेज़-पा का तसव्वुर भी मिट गया
ग़म ऐसे मुस्तक़िल मिले और इस क़दर मिले
ग़ज़ल
रम्ज़-आशना मिले कई अहल-ए-नज़र मिले
हरी चंद अख़्तर

