रम्ज़-आश्ना-ए-फ़स्ल-ए-बहाराँ कोई न था
सब मुद्दई' थे चाक-गरेबाँ कोई न था
दीवाने दश्त में भी नसीब आज़मा चुके
वाँ भी सुकून-ए-क़ल्ब का सामाँ कोई न था
क्या क्या तिरे मरीज़ को थे नाज़ दर्द पर
जब बस में चारागर के भी दरमाँ कोई न था
शायद ये काएनात थी मय-ख़ाना इन दिनों
जब इम्तियाज़-ए-गब्र-ओ-मुसलमाँ कोई न था
घबरा के किस को राह में ऐ 'दिल' पुकारते
अपने सिवा क़रीब-ए-रग-ए-जाँ कोई न था
ग़ज़ल
रम्ज़-आश्ना-ए-फ़स्ल-ए-बहाराँ कोई न था
दिल अय्यूबी

