रक्खा था जिसे दिल में वो अब है भी नहीं भी
यूँही मिरे जीने का सबब है भी नहीं भी
पहुँचा है तिरे महर से क़ुतबैन का मौसम
दिन था तो नहीं भी था ये शब है भी नहीं भी
फ़रियाद ने सीखी है तिरी वज़्-ए-तबस्सुम
इस रुख़ से कि शर्मिंदा-ए-लब है भी नहीं भी
हैरत-कदा-ए-दहर है इक ख़्वाब का आलम
देखा जो इस आलम में अजब है भी नहीं भी
मिल जाए तो कतराऊँ जो खो जाए तो ढूँडूँ
ये कैसी तलब है कि तलब है भी नहीं भी
ये हिज्र की दोज़ख़ ही भली जैसी है सब है
इस वस्ल की जन्नत से कि सब है भी नहीं भी
ग़ज़ल
रक्खा था जिसे दिल में वो अब है भी नहीं भी
मोहम्मद अाज़म

