EN اردو
रक्खा नहीं ग़ुर्बत ने किसी इक का भरम भी | शाही शायरी
rakkha nahin ghurbat ne kisi ek ka bharam bhi

ग़ज़ल

रक्खा नहीं ग़ुर्बत ने किसी इक का भरम भी

ज़ुहूर नज़र

;

रक्खा नहीं ग़ुर्बत ने किसी इक का भरम भी
मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी

लूटा है ज़माने ने मिरा बेश भी कम भी
छीना था तुझे छीन लिया है तिरा ग़म भी

बे-आब हुआ अब तो मिरा दीदा-ए-नम भी
ऐ गर्दिश-ए-आलम तू किसी मोड़ पे थम भी

सुन ऐ बुत-ए-जाँ-दार बुत-ए-सीमबर ऐ सुन
तोड़े न गए हम से तो पत्थर के सनम भी

मैं वस्ल की भी कर न सका शिद्दत-ए-ग़म कम
आया न किसी काम तिरे हिज्र का सम भी

दीवार-ए-सुकूँ बैठ गई शिद्दत-ए-नम से
बरसा है मिरे घर पे अगर अब्र-ए-करम भी

तन्हाई न पूछ अपनी कि साथ अहल-ए-जुनूँ के
चलते हैं फ़क़त चंद क़दम राह के ख़म भी

सहरा-ए-ग़म-ए-जाँ में बगूलों से बचा कौन
मिट जाएँगे ऐ दोस्त तिरे नक़्श-ए-क़दम भी

सुनते हैं चमकता है वो चाँद अब भी सर-ए-बाम
हसरत है कि बस एक नज़र देख लें हम भी