रही उन की चीन-ए-जबीं देर तक
चढ़ाया किए आस्तीं देर तक
उड़ाती रही ख़ाकसारों की ख़ाक
तुम्हारी गली की ज़मीं देर तक
किसी के जो आने की उम्मीद थी
रही लब पे जान-ए-हज़ीं देर तक
रही देख कर नक़्शा-ए-कू-ए-यार
तहय्युर में ख़ुल्द-ए-बरीं देर तक
वो नैरंगियाँ मेरे रोने में थीं
कि हँसते रहे सब हसीं देर तक
ग़ज़ल
रही उन की चीन-ए-जबीं देर तक
आशिक़ अकबराबादी

