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रही उन की चीन-ए-जबीं देर तक | शाही शायरी
rahi unki chin-e-jabin der tak

ग़ज़ल

रही उन की चीन-ए-जबीं देर तक

आशिक़ अकबराबादी

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रही उन की चीन-ए-जबीं देर तक
चढ़ाया किए आस्तीं देर तक

उड़ाती रही ख़ाकसारों की ख़ाक
तुम्हारी गली की ज़मीं देर तक

किसी के जो आने की उम्मीद थी
रही लब पे जान-ए-हज़ीं देर तक

रही देख कर नक़्शा-ए-कू-ए-यार
तहय्युर में ख़ुल्द-ए-बरीं देर तक

वो नैरंगियाँ मेरे रोने में थीं
कि हँसते रहे सब हसीं देर तक