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रह रहे हैं मकीं शबों के | शाही शायरी
rah rahe hain makin shabon ke

ग़ज़ल

रह रहे हैं मकीं शबों के

एजाज़ गुल

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रह रहे हैं मकीं शबों के
क्या हुए ढेर सूरजों के

आँख में ख़्वाब मुंजमिद हैं
रंग बरसाओ हौसलों के

ख़ून से तय किए गए हैं
रास्ते ज़र्द मौसमों के

मक़्तलों से उठाए मैं ने
फूल से जिस्म दोस्तों के

ऐ ज़मीं तेरी अज़्मतों में
बह गए शहर वाहिमों के