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रफ़्ता रफ़्ता सब मनाज़िर खो गए अच्छा हुआ | शाही शायरी
rafta rafta sab manazir kho gae achchha hua

ग़ज़ल

रफ़्ता रफ़्ता सब मनाज़िर खो गए अच्छा हुआ

प्रकाश फ़िक्री

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रफ़्ता रफ़्ता सब मनाज़िर खो गए अच्छा हुआ
शोर करते थे परिंदे सो गए अच्छा हुआ

कोई आहट कोई दस्तक कुछ नहीं कुछ भी नहीं
भूली बिसरी इक कहानी हो गए अच्छा हुआ

एक मुद्दत से हमारे आईने पे गर्द थी
आँसुओं के सैल उस को धो गए अच्छा हुआ

बेकली कोई न थी तो दिल बड़ा बे-ज़ार था
अब हवादिस दर्द इस में बो गए अच्छा हुआ

रंग अपना हो नुमायाँ शौक़ बेजा था हमें
रास्तों की धूल में हम खो गए अच्छा हुआ

बे-सबब रोता था 'फ़िक्री' और रुलाता था हमें
अब ज़माना हो गया उस को गए अच्छा हुआ