रब्त किस से था किसे किस का शनासा कौन था
शहर भर तन्हा था लेकिन मुझ सा तन्हा कौन था
मैं समुंदर था मगर वीराँ था सहरा की तरह
मेरे घर तक चल के आता इतना प्यासा कौन था
रेज़ा-ए-संग-ए-अना था राह का कोह-ए-गिराँ
बढ़ के लग जाता मिरे सीने से ऐसा कौन था
सतह पर ख़ामोशियों की गूँज है नौहा-कुनाँ
अपनी गहराई के दरिया में जो डूबा कौन था
ज़ात आख़िर ज़ात थी शहकार फिर शहकार थी
किस के फ़न के वास्ते से किस को समझा कौन था
पाँव धरती पर थे लेकिन ज़ेहन थे आकाश पर
सब के सब मेरी तरह बिखरे थे यकजा कौन था
कुछ बुरे थे कुछ भले थे ख़ार कुछ गुलज़ार कुछ
हर कोई इंसान था आख़िर फ़रिश्ता कौन था
वो भड़क उट्ठा तो 'ख़ालिद' सोचता ही रह गया
ख़ूब-रू पैकर के अंदर तुंद-ख़ू सा कौन था
ग़ज़ल
रब्त किस से था किसे किस का शनासा कौन था
ख़ालिद अहमद

